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Friday, September 2, 2016

इतिहास अपने को दोहराता है ....( लघुकथा )

    इतिहास अपने को दोहराता है ..

   दरवाजे पर घंटी बोली तो राधे मोहन जी ने पत्नी भगवती जी को आवाज़ लगायी।
     " देखो तो, कहीं मिनी ही ना आई हो ! "
    " हां लगता तो है ...."
      दरवाजा खोला तो सामने मिनी के पति और सास खड़े थे।
        आवभगत के साथ-साथ मिनी के ना आने की वजह भी  पूछी गई।
       " जब बच्चों की छुट्टियां होंगी तब मिनी भी आ जायेगी। अभी तो हम किसी रिश्तेदारी में मिलने जा रहे थे  तो सोचा आपसे मिलते चलें।पता चला था कि आपके पैर में फ्रेक्चर हो गया है।  " मिनी की सास ने सहजता से कहा।
राधामोहन जी की आंखे नम हो आई। आँखे नम, पैर के दर्द से कम और मिनी के ना आने से अधिक हुयी।
       भगवती जी से यह छुप ना सका।
       रसोई में मेहमानों के लिए चाय-नाश्ता तैयार करते हुए उन्होंने भी आँखे पोंछ ली। सहसा उनकी स्मृति में बहुत साल पहले की आज से मिलती जुलती घटना तैर गई। कुछ ऐसा ही मंजर था। उनके पिता जी भी  बीमार थे और राधेमोहन जी अकेले ही मिल आये थे, कि उनकी बेटी छुट्टियों  में ही आ पायेगी। भगवती जी और उनके पिता रो कर, मन मसोस कर रह गए थे।
         मेहमानों के चले जाने के बाद राधेमोहन जी मायूसी से बोले, " मिनी नहीं आयी ! "
" तकलीफ तो मुझे भी है उसके ना आने पर, लेकिन मास्टर जी ! सारी उम्र इतिहास पढ़ाते रहे हो और यह भी याद नहीं रहा कि ' इतिहास अपने को दोहराता है .....'

( उपासना सियाग , अबोहर )