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Sunday, August 12, 2012

जीत

      (जमाना कोई भी हो , जब - जब किसी स्त्री ने अपने ऊपर  हुए जुल्मों के विरुद्ध आवाज उठाई है। उसे न्याय अवश्य ही मिला है। ये घटना अंग्रजों के ज़माने की है।)
    सावित्री रात के अमावस के से अँधेरे को चीरती हुई आगे बढती जा रही थी। सहसा उसे चार जोड़ी आँखें ,वासना से भरी और लपलपाती जुबान अपनी आँखों के आगे कौंध गयी और उसने ऊँठ की नकेल  खींच डाली। जोर से रुलाई  फूट पड़ी।
      सोलह वर्षीय बालिका वधु सावित्री, ब्याह कर ससुराल आयी तो सास -ससुर और ननद कोई भी नहीं था। पति रण  विजय सिंह इकलौते ही थे। माँ जन्म  देते ही स्वर्ग सिधार गयी तो पिता भी उसके दस वर्ष के होते -होते गुजर लिए थे।  उनका पालन उनकी बुआ जमुना ने ही किया था। घर में सिर्फ वे तीन ही प्राणी थे। पति के परिवार में नजदीक - दूर के भाई, रिश्तेदार तो थे ही।  जिनसे सावित्री की मुलाकात उसके पति ने विवाह के उपरांत करवाया था।
        राम-स्वरूप ,जय सिंह ,प्रताप सिंह और कमल -किशोर ये चार चचेरे भाई थे। जो भाई कम और मित्र अधिक थे। उनसे मुलाकात करवाते हुए ऐसा ही कहा था ।उनसे मुलाकात करवाते हुए, उसके पति ने बताया था ।  उन्होंने  बड़े ही सलीके से सावित्री को प्रणाम किया था और भाभी तो माँ का स्वरूप होती है, भी कहा था।  लेकिन जय सिंह ने तो दंडवत प्रणाम करते हुए,धीरे से उसका पैर छू  लिया था।  बालिका वधु  सावित्री लिजलिजे स्पर्श को समझ गयी।  बिन कहे ही भीतर की और चली गयी।
     पति की बहुत बड़ी जमींदारी  थी। बहुत नाम, पैसा और जन-कल्याण में आगे रहने पर नाम भी बहुत था। वे हमेशा ही लोगों से घिरे रहते या फिर अपने खेतों की और निकल जाते। इतने बड़े जमींदार होते हुए भी घमंड का नामो  निशान ही नहीं था उनमे। सावित्री को भी घर में पर्दा करने से मना करते थे। सावित्री अपने बेटे रूपी देवरों से परदा तो नहीं करती थी पर एक दूरी बनाये रखती थी।
      कुछ समय बाद पुत्र का जन्म हुआ।  सावित्री  मायके में थी । ससुराल में तो कोई था नहीं जो उसकी देख-भाल करता।  तीन महीने बाद सावित्री का ससुराल आगमन हुआ तो उसका बड़ा भव्य स्वागत हुआ और होता भी क्यूँ नहीं आखिर, बेटा जो हुआ था। जमुना बुआ तो बौराई सी फिर रही थी। घर के आगे बधाई मांगने वालों का तांता लगा हुआ था। आँगन में बच्चे के स्वागत में गीत गए जा रहे थे।  ढ़ोल  की धमक दूर - दूर तक गूंज रही थी। बहुत धूम  -धाम मची हुई  थी, कि  अचानक  ही  ढ़ोल  की आवाज़ बंद हो गयी और एक अफरा -तफरी सी मच गयी। सावित्री का मन जैसे बैठ सा गया। वह हैरान थी कि कोई उसे कुछ बता क्यों नहीं रहा ?
      थोड़ी ही देर में खुशियाँ मातम में बदल गयी। सावित्री ने देखा कुछ लोग उसके पति की मृत देह आंगन में लिटा रहे हैं। वह देख कर जड़ सी हो गयी और ना जाने कितने सवाल उसके जेहन में दौड़ने लगे वो समझ ही नहीं पा रही थी। आखिर ये हुआ क्या और क्यूँ ....?
   उसके पति को सांप ने काट लिया था। जहर इंतना तेज़ था कि रण  विजय की वहीँ पर मौत हो गयी।
    दुल्हन सी सजी सावित्री सुन्न हुई बैठी थी। छोटे से बच्चे ने पिता का मुहं भी न देखा था और पिता  भी अपने बेटे को बिन देखे ही दुनिया चला गया।
       जब दुनिया से लोग चले जाते है तो एक बार ऐसा ही लगता है कि  अब दुनिया ही ख़त्म हो गयी हो। ऐसा ही सावित्री को लग रहा था। पति के राज़ में तो कभी घर से भी बाहर नहीं निकली थी। हाँ , कभी - कभी  शहर भी गयी तो कुछ खरीददारी करने ही गयी थी । कैसे क्या होगा ? कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।अपने नन्हे बेटे का सोच कर कुछ हिम्मत भी बंधने लगी थी।
     ईश्वर भी जब सहारा छीन लेते है तो वह  हौसला  बन कर स्वयं उसके साथ रहते हैं । क्यूँ कि  वह अन्याय तो कर ही नहीं सकते। यह इन्सान ही होता है जो झट से मुहं उपर कर उसे दोष देने लग जाता है। किसी भी इन्सान को दुखी देख कर, वह  खुद भी बहुत दुखी ही होता है।
        पति की मौत के लगभग तीन महीने बाद उसके पति के मित्र जो उसे भाभी माँ ही कहते थे। उसके पास आ कर बोले, " देख भाभी , अब रण विजय तो रहा नहीं। अब इतनी बड़ी जमींदारी को तू अकेले कैसे संभालेगी। तो जो भी देवर तुझे पसंद है , उसकी चूड़ी पहन ले ...और हाँ,बाकी के तीन भी तेरी 'सेवा ' के लिए हाज़िर रहेंगे, जब तू चाहेगी !" ये शब्द जय सिंह के थे। इस बात पर सब ठहाका लगा कर हंस पड़े। सावित्री सन्न रह गयी और हैरान होते हुए उनके चेहरे और आँखों की  तरफ देखा। उनके चेहरों के लिजलिजे भावों को समझते हुए अपने चेहरे पर लंबा घूँघट निकलते हुए कहा कि  उसे सोचने का समय दो।
  " दिवाली को दो महीने पड़े हैं तू सोच ले अच्छी तरह से ...किसके घर दिये जलायेगी !" आपस में हाथों पर ताली मार कर हँसते हुए चले गए। ये हंसी सावित्री को जहर बुझे हुए तीर से कम ना लगी थी।
           वह सूरज के ढलने का समय था। एक बार तो सावित्री को लगा के उसकी किस्मत का सूरज भी ढल रहा हो। मुँह कुम्हला गया। बहुत सारे विचारों से उथल-पुथल चल रही थी। सहसा  सिहर उठी और दौड़ कर अपने नन्हे को गोद में उठा कर सीने में भीच लिया ।जमुना बुआ ने प्यार से कंधे पर हाथ रखा तो बिलख पड़ी। बुआ का साथ उसे बहुत सहारा दे रहा था।
                  कुछ देर सोचती रही फिर कुछ सोच  सोच कर उठी कि  उसने ऐसे ही तो हिम्मत नहीं हारनी है। संध्या की बेला हो रही थी। उसने पर सभी कमरों रखे  दीपक जला दिए और जमुना बुआ से कहा ," बुआ जब तक मैं ना लौटूं , किसी भी कमरे का दिया बुझना नही चाहिए।"
       बुआ के पूछने पर भी कुछ नहीं बताया और अपने नन्हे को पीठ पर बाँध कर ,ऊँठ  पर सवार हो कर बोली ," बुआ अब मैं सुबह सूरज उगने के साथ लौटूंगी...!"
     अचानक नन्हे के कुनमुनाने से सावित्री की तन्द्रा भंग हुई तो वह वर्तमान में आयी और आगे बढ़ गयी।जैसे -जैसे शहर नजदीक आ रहा था , रात का अँधेरा भी कम होता जा रहा था दूर भोर की लाली चमक रही थी। शहर में जा कर उसने किसी से अंग्रेज ऑफिसर का पता पूछा।  अंग्रेज -ऑफिसर के , घर के आगे खड़े दरबान से गोरे -साहब के बारे में पूछने लगी और बताया कि उससे बहुत जरुरी काम है । दरबान ने बताया कि  साहब का अब सैर पर  जाने का समय है वो अभी किसी से नहीं मिलेंगे ,तुम बाद में आना।  सावित्री ने हुए मिन्नत  की, कि उसे अभी ही मिलना है साहब से ...!
    तभी अन्दर से अंग्रेज -ऑफिसर को आते देखा तो वह दौड़ कर उनके पास पहुंची और बोली वह बहुत मुसीबत में है और उसकी बात सुनी जाए।
      ऑफिसर एक भला इन्सान था।  लॉन  बैठा कर  बहुत ध्यान से उसकी सारी बात सुनी।  सुन कर द्रवित हो कर उसके सर पर हाथ रख  कर बोला ," तुम चिंता मत करो ,मैं  ऐसा कुछ करूँगा कि  तुम्हे कोई कुछ कह नहीं सकेगा।"
   फिर अपने सहायक को बुला कर कागज़ तैयार कर उसे कुछ समझाया।  उसे सावित्री और उसके बेटे को अपनी गाड़ी  में भेज दिया और उसका ऊँठ  किसी के साथ रवाना कर दिया।
   गाँव में पहुँच कर सहायक वहां के मुखिया से मिला और सावित्री के घर के आगे वह के निवासियों के आगे एकत्रित होने को कहा।
         कुछ देर में सभी वहां मौजूद थे। सभी ग्रामीण  निवासियों के आगे ,ऑफिसर के सहायक ने पढना शुरू किया ,जो उस अंग्रेज ऑफिसर ने लिखा था। उस कागज़ में लिखा था कि  सावित्री देवी और उसका पुत्र अब सरकार के संरक्षण में है। अगर उन दोनों को किसी भी प्रकार की कोई भी हानि पहुँचती है तो वो अपराधी घोषित कर दण्डित किया जायेगा।
         गाँव में किसी को क्या ऐतराज़ होता भला। वे तो सावित्री के लिए अच्छा ही चाहते थे ।  लेकिन उसके देवरों को तो ये सर्प दंश से कम नहीं था। वे कुछ देर देखते रहे फिर पैर पटक कर चलते बने। सावित्री ने अपने घर के दरवाज़े बंद कर लिए। और एक राहत की साँस ली।आज उसकी हिम्मत और हौसले की जीत हुई थी।